अकाली दल की चुनावी हार के कई कारण

Sunday, March 12, 2017 12:53 AM
अकाली दल की चुनावी हार के कई कारण

चंडीगढ़(ए.एस. पराशर): पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल को मिली करारी हार के कई कारण हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण गत 10 वर्ष के लंबे समय से प्रदेश पर राज कर रही सरकार के खिलाफ जनता में सत्ता विरोधी लहर है।  पंजाब की जनता अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार से ऊब चुकी थी और वह गत कुछ वर्षों से बदलाव की तलाश में थी। इसकी झलक 2014 के लोकसभा चुनाव में उस समय दिखाई दी जब प्रदेश में न के बराबर मौजूदगी होने के बावजूद आम आदमी पार्टी 4 संसदीय सीटें जीती। 

अकाली दल के हाथ केवल 4 तथा भाजपा को 2 सीटें ही मिल सकीं। कांग्रेस ने 3 सीटें जीतीं। अकाली दल की हार का एक मुख्य कारण आम आदमी पार्टी भी रही जिसके चलते प्रदेश के सभी 117 हलकों में त्रिकोणीय मुकाबले हुए। इसमें संदेह नहीं कि गत कुछ वर्षों में सुखबीर सिंह बादल की रहनुमाई में प्रदेश में काफी विकास कार्य हुए लेकिन ये सब कुछ पंजाब की जनता को संतुष्ट नहीं कर सके। जनता का कहना था कि विकास की आड़ में सत्तारूढ़ गठबंधन विशेषत: अकाली दल ने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया है। यह असहनीय है। 

चाहे रेत-बजरी माफिया या शराब माफिया, केबल माफिया हो या ट्रांसपोर्ट माफिया चारों ओर बेरोक-टोक माल काटा जा रहा था। सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह रही कि अकाली नेतृत्व को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखा और वह इसका लगातार बचाव करता रहा। उसका कहना था कि यदि कोई अकाली नेता टी.वी. बिजनैस करना चाहता है या बसें चलाना चाहता है या फिर शराब का व्यापार अथवा होटल निर्माण करना चाहता है तो इसमें क्या बुरा है? उसे इसमें कानफ्लिक्ट ऑफ इंट्रस्ट नजर नहीं आता था। 

वेतन देने को पैसा नहीं
सरकारी खजाने का बुरा हाल था। कई बार तो सरकारी कर्मचारियों को वेतन के भुगतान के लिए सरकार को बैंकों से ऋण लेना पड़ता था। रोजमर्रा के सरकारी खर्चों के लिए सरकारी जमीन-जायदाद गिरवी रखनी पड़ी लेकिन अकाली नेतृत्व का यह कहना था कि बैंकों या वित्तीय संस्थानों से उधार लेना कुछ गलत नहीं है। दुनिया भर में यही प्रथा है। जब मीडिया इस पर शोरगुल करता था तो उसे यह फटकार सुननी पड़ती थी कि पंजाब को बदनाम मत करो। 

ग्रंथों की बेअदबी  
गत लगभग 2 वर्षों में प्रदेश के विभिन्न भागों में धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी के मामले रोशनी में आने से लोगों के जज्बात भड़क गए और सरकार पर दोषियों को तुरंत पकड़ कर सजा देने का दबाव बढ़ गया। कुछ मामले हल भी हुए लेकिन सरकारी कार्रवाई जनता को संतुष्ट न कर सकी। बेअदबी घटनाओं से अकाली दल का परंपरागत पंथक वोट उसके खिलाफ हो गया। 

डेरा प्रेमी फैक्टर
मतदान से ठीक 2 दिन पहले डेरा प्रेमियों द्वारा अकाली दल को समर्थन देने के ऐलान से एक नई स्थिति पैदा हो गई। जहां एक ओर अकालियों को प्रेमियों के वोट मिले वहीं दूसरी ओर अकाली दल के परंपरागत पंथक वोट बैंक में रोष व्याप्त हो गया। कई स्थानों से समाचार मिलने लगे कि पंथक वोट अकाली दल की बजाय कांग्रेस के पक्ष में भुगते हैं।

हलका इंचार्ज सिस्टम
अकालियों की हार का एक और कारण पार्टी द्वारा लागू किया गया हलका इंचार्ज सिस्टम भी रहा जिसके तहत स्थानीय अकाली नेताओं को विभिन्न हलकों का इंचार्ज बना दिया गया जो न केवल स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की समस्याएं हल करने में मदद करते थे बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन तथा पुलिस के अधिकारियों की बदलियों इत्यादि में भी हस्तक्षेप करते थे। इतना ही नहीं, कई स्थानों पर हथियार का लाइसैंस लेने के लिए स्थानीय हलका इंचार्ज से नो ऑब्जैक्शन सर्टीफिकेट लेना अनिवार्य हो गया था। हलका इंचार्जों की कारगुजारी से आम जनता में भारी रोष उत्पन्न हो गया। 



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