कैडर और वोटर की नाराजगी ले डूबी भाजपा को

Sunday, March 12, 2017 1:33 AM
कैडर और वोटर की नाराजगी ले डूबी भाजपा को

जालंधर(पाहवा): पंजाब में भाजपा की आज जो स्थिति है उसे देखकर यह बात साफ हो रही है कि पंजाब के भाजपा नेताओं ने उस जोश व जुनून के साथ पार्टी के लिए काम नहीं किया। साथ ही पार्टी से लगातार विमुख हो रहे व्यापारी व उद्योगपति वर्ग, जो भाजपा का अहम वोटर है, को दरकिनार करना भी पार्टी के लिए आत्महत्या जैसा साबित हुआ है। 

मोदी ने पकड़ा रांग ट्रैक
पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 प्रमुख रैलियां कीं जिनमें एक जालंधर तथा दूसरी कोटकपूरा में आयोजित की गई थी। दिलचस्प बात है कि मोदी जालंधर में मंच पर करीब 45 मिनट तक संबोधित करते रहे लेकिन जिस स्थान पर यह मंच लगा था, उसके आसपास के क्षेत्र की ही 3 सीटें भाजपा हार गई। इसमें यह कतई नहीं कहा जा सकता कि मोदी भाजपा के पक्ष में वोट देने के लिए लोगों को प्रेरित नहीं कर सके बल्कि इसके पीछे जो मुख्य कारण था वह यह था कि मोदी मंच से प्रकाश सिंह बादल की महिमा का गुणगान करते रहे जबकि पंजाब में पहले से ही शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ काफी गुस्से का माहौल जनता में पाया जा रहा था। 

वार रूम तक ही रही भाजपा की ‘वार’
मोदी की इन रैलियों का नतीजा अगर भाजपा की सीटों की जीत के तौर पर सामने नहीं आया तो उसकी एक बड़ी वजह यह है कि मोदी की कोशिश को भाजपा की प्रदेश लीडरशिप ने अमलीजामा नहीं पहनाया है। पार्टी के नेता केवल डिजीटल संचार माध्यमों के जरिए ही पार्टी की जीत की कामना करते रहे लेकिन पार्टी के वर्कर तक पहुंच की बात किसी ने नहीं की। जालंधर तथा चंडीगढ़ में बाकायदा वार रूम बना कर लाखों रुपया बेकार कर दिया गया जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी वार रूम के अंदर ही ‘वार’ में उलझी रही। पंजाब में भाजपा वर्कर के पिछले 5-7 वर्षों से काम नहीं हो रहे थे। जिसके कारण वह अंतत: घर ही बैठ गया। 

निराश होता गया भाजपा वर्कर 
करीब 1 वर्ष पहले पंजाब में भाजपा वर्कर के अंदर एक बार फिर से जोश तब आया जब सोशल मीडिया पर नवजोत सिंह सिद्धू को सी.एम. चेहरा बना कर अकेले 117 सीटों पर चुनाव लडऩे की चर्चा शुरू हुई, जैसा कि महाराष्ट्र तथा हरियाणा में पार्टी ने अलग होकर चुनाव लड़ा तथा जीत हासिल की। भाजपा वर्कर का यह जोश अधिक देर तक नहीं चला तथा इसकी उस समय हवा निकल गई जब सिद्धू ने राज्यसभा सदस्य के पद से इस्तीफा दे दिया। भाजपा वर्कर के हौसले लगातार टूटते गए तथा अंत में वह साइलैंट होता गया। एक यह स्थिति भी आई कि वह खुद ही चाहने लगा कि पंजाब में अकाली दल सत्ता में दोबारा न आ पाए। यह इसी का परिणाम है। 



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