दोआबा में कैप्टन को नहीं मिल रहा विश्वासपात्र सिपहसालार

Tuesday, March 13, 2018 10:50 AM
दोआबा में कैप्टन को नहीं मिल रहा विश्वासपात्र सिपहसालार

जालंधर  (रविंदर): राणा गुरजीत सिंह के हाशिए पर चले जाने के बाद मुख्यमंत्री कै. अमरेंद्र सिंह को दोआबा में कोई विश्वासपात्र सिपहसालार नहीं मिल पा रहा है या दूसरे शब्दों में यह कहें कि दोआबा में अपने किसी भी विधायक पर कैप्टन का अभी तक विश्वास नहीं बन पा रहा है। यही कारण है कि दोआबा में होने वाले कैप्टन के सभी प्रोग्रामों की कमान किसी भी विधायक को नहीं सौंपी गई। कैप्टन के दोआबा में सभी प्रोग्रामों की कमान मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव कै. संदीप संधू के हवाले है। 

कुछ महीनों पहले की बात कुछ और थी। कैप्टन के पास दोआबा में राणा गुरजीत सिंह जैसा विश्वासपात्र था। यहां तक कि दोआबा में होने वाले किसी भी सरकारी प्रोग्राम या पार्टी के किसी भी प्रोग्राम की जिम्मेदारी राणा गुरजीत सिंह को ही सौंपी जाती थी। मगर रेत खनन नीलामी के आरोपों में घिरने के बाद जैसे ही राणा गुरजीत सिंह की कुर्सी चली गई तो उनके सितारे गर्दिश में चले गए। राणा गुरजीत सिंह न तो सरकार का हिस्सा रहे और न ही कैप्टन के प्रोग्रामों का कोई हिस्सा बन पा रहे हैं। जालंधर की बात करें तो पिछले सप्ताह करतारपुर में जंग-ए-आजादी के फेज टू का उद्घाटन करने मुख्यमंत्री आए थे। 

 


मुख्यमंत्री बनने के बाद दोआबा में कैप्टन का यह पहला बड़ा प्रोग्राम था। नियमों के मुताबिक देखें तो या तो दोआबा के किसी बड़े नेता को इस प्रोग्रामों के प्रबंधों की कमान सौंपी जाती या फिर इलाका विधायक को सौंपी जाती मगर ऐसा कुछ नहीं हो सका। न तो इलाका विधायक को ही ज्यादा तवज्जो दी गई और न ही दोआबा के अन्य नेताओं पर विश्वास जताया गया। प्रोग्राम की सारी जिम्मेदारी संदीप संधू के हवाले ही थी। 


अब 14 मार्च को एक बार फिर मुख्यमंत्री दोआबा की धरती यानी नकोदर में आ रहे हैं। यहां वह किसानों की कर्ज माफी स्कीम के तहत समारोह करने आ रहे हैं। एक बार फिर से हलका इंचार्ज और दोआबा के किसी नेता के हवाले प्रोग्राम की कमान सौंपने की बजाय कैप्टन ने अपने विश्वासपात्र संदीप संधू की ही ड्यूटी लगाई है। संदीप संधू समारोह के प्रबंधों का जायजा लेने सोमवार को नकोदर हलके में ही थे। भीड़ जुटाने से लेकर समारोह को कामयाब बनाने तक की सारी जिम्मेदारी उन्हीं के हवाले है। मगर कैप्टन की दोआबा में चल रही इस रणनीति से अंदर ही अंदर विधायकों में रोष पनपने लगा है। विधायकों को इस बात का गुस्सा भी है कि उन पर विश्वास क्यों नहीं जताया जा रहा है। जिस तरह से जालंधर के पांचों विधायकों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है, उससे आने वाले दिनों में उनका मंत्रिमंडल में स्थान पाना भी काफी मुश्किल नजर आ रहा है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो दोआबा के विधायकों में कैप्टन के प्रति खासा रोष पनप सकता है। वहीं पार्टी के सीनियर नेता भी इसे अच्छा संकेत नहीं मान रहे हैं। वह कहते हैं कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो पार्टी को पंजाब में भी सत्ता से बाहर जाने से कोई नहीं रोक सकता है। 


 

लोकसभा चुनाव परिणामों पर भी पड़ सकता है असर
देश की बात करें तो एक-एक कर सभी राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल चुके हैं। किसी तरह पंजाब में 10 साल बाद कांग्रेस की वापसी हुई है और ऐसे में पार्टी के सभी विधायकों व नेताओं को काफी उम्मीदें हैं। मगर जिस तरह से मुख्यमंत्री द्वारा अपने ही विधायकों को हर बात पर नजरअंदाज किया जा रहा है, उसका असर आने वाले लोकसभा चुनावों के परिणामों पर भी पड़ सकता है। एक तरफ पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में इस बात की चर्चा होने जा रही है कि किस तरह से देश की सत्ता पर वापसी की जाए, वहीं दूसरी तरफ पंजाब में खुद ही अपने विधायकों को नाराज करने की दिशा में काम किया जा रहा है। 



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