दलित सियासत किस ओर, क्यों बिखरा वोट बैंक

Sunday, March 12, 2017 2:04 AM
दलित सियासत किस ओर, क्यों बिखरा वोट बैंक

 जालंधर: पंजाब विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस की जबरदस्त जीत हुई है। चुनावी इतिहास ने जबरदस्त करवट ली है। बनते-बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों के चलते किसी भी राजनीतिक पार्टी का वोट बैंक स्थिर नहीं रहा। चुनाव नतीजे जो भी रहे हैं लेकिन वोट बैंक बंट जाने से हरेक पार्टी को वोट का नुक्सान हुआ है। वहीं जहां तक दलित वोट बैंक की बात है तो बसपा का वोट बैंक पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबला बुरी तरह गिरा है। 

भले ही 2012 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सीट नहीं जीत पाई थी लेकिन उसका वोट बैंक एक हद तक ठीक था लेकिन 2017 के चुनाव में यह गिर गया है। 2012 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 5,97,020 वोट पड़े थे लेकिन 2017 के चुनाव में बसपा को 2,31,329 वोट ही पड़े। पिछले विधानसभा चुनावों में बसपा का वोट बैंक 4.29 प्रतिशत था जबकि इस बार यह मात्र 1.50 प्रतिशत रह गया है। 3 प्रतिशत के करीब बसपा का वोट बैंक बिखर कर दूसरी पार्टियों की तरफ  चला गया। सवाल यह उठता है कि यह वोट बैंक क्यों बिखर गया जबकि पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी का वोट प्रतिशत 23.9 रहा। 

अपनी सीट भी नहीं बचा पाए करीमपुरी
फिल्लौर विधानसभा से बसपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे प्रदेश पार्टी अध्यक्ष अवतार सिंह करीमपुरी को मात्र 28,035 वोट ही पड़े जबकि बसपा से ही अकाली दल में गए बलदेव सिंह खैहरा 41,336 वोट लेकर इस सीट से विजयी रहे। वहीं आम आदमी पार्टी को इस सीट पर सरूप सिंह को 35,779 वोट पड़े। 

तकड़ी के पलड़ों में बैठकर जीते बसपा के 2 पूर्व नेता
आदमपुर विधानसभा हलके से कांग्रेस के मोहिंद्र सिंह के.पी. को हराकर जीते शिअद के पवन कुमार टीनू कभी बसपा के कद्दावर नेताओं में गिने जाते थे। टीनू को इस चुनाव में 45,229 वोट पड़े हैं जबकि मोहिंद्र सिंह के.पी. को 37,530 वोट पड़े। दूसरी तरफ  फिल्लौर विधानसभा हलकेसे जीतने वाले दलित नेता बलदेव सिंह खैहरा भी बसपा से निकल कर शिअद की तकड़ी के पलड़े में बैठकर चुनावी समर पार कर पाए हैं।  



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