पंजाब के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए हाईकोर्ट का फैसला, 30 जून तक का अल्टीमेटम
punjabkesari.in Monday, Apr 20, 2026 - 01:20 PM (IST)
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब के कर्मचारियों और पेंशनरों के महंगाई भत्ते के बकाए को लेकर ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यह कोई तोहफा नहीं, बल्कि कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने रविवार को जारी अपने 94 पन्नों के आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी कर्मचारियों और पेंशनरों को ऑल इंडिया सर्विसेज के अधिकारियों की तर्ज पर बकाया राशि का भुगतान 30 जून तक सुनिश्चित करे।
...तो वह एरियर देने से पीछे नहीं हट सकती
अदालत ने राज्य सरकार की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें वित्तीय तंगी और संसाधनों की कमी का हवाला देकर भुगतान टालने की कोशिश की गई थी। अदालत ने साफ कहा कि जब सरकार छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर चुकी है, तो वह एरियर देने से पीछे नहीं हट सकती। अदालत ने टिप्पणी की कि वित्तीय कठिनाइयों को सरकारी जिम्मेदारियों से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता और एक जिम्मेदार नियोक्ता के रूप में सरकार को अपने कर्मचारियों के प्रति निष्पक्ष रहना होगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने 18 फरवरी 2025 को जारी उस ‘लिक्विडेशन प्लान’ को भी रद्द कर दिया, जिसमें पेंशनरों को उम्र के आधार पर बांटकर अलग-अलग किश्तों में भुगतान करने का प्रावधान किया गया था। इस योजना के तहत 75 साल से कम उम्र के पेंशनरों को 42 किश्तों में भुगतान का प्रस्ताव था, जबकि 75 साल से अधिक उम्र वालों को प्राथमिकता दी गई थी। अदालत ने इसे कृत्रिम वर्गीकरण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन माना।
35,000 पेंशनर अपने बकाया लाभ का इंतजार करते-करते दुनिया छोड़ गए
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार आईएएस, आईपीएस और अन्य ऑल इंडिया सर्विसेज के अधिकारियों को केंद्र के पैटर्न पर नियमित डीए दे रही है, जबकि राज्य के कर्मचारियों और पेंशनरों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। यह असमानता तुरंत खत्म की जानी चाहिए, क्योंकि महंगाई का असर सभी वर्गों पर समान रूप से पड़ता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने मुख्य सचिव को आदेशों के पालन की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी है और उन्हें 2 जुलाई तक हाईकोर्ट में अनुपालन हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो बकाया राशि पर ब्याज देने के मुद्दे पर भी विचार किया जाएगा। यह फैसला निर्मल सिंह धनेआ समेत अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर आया है। याचिकाओं में दलील दी गई थी कि वर्ष 2016 से अब तक करीब 35,000 पेंशनर अपने बकाया लाभ का इंतजार करते-करते दुनिया छोड़ चुके हैं। छठे वेतन आयोग ने भी सिफारिश की थी कि डीए के भुगतान में कोई समय अंतराल नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे महंगाई के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता खत्म हो जाती है। अदालत ने इस मानवीय पहलू को गंभीरता से लेते हुए कहा कि देरी से भुगतान करने से महंगाई भत्ते का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है, इसलिए समय पर भुगतान अनिवार्य है।

