पंजाब में हिंदू वोट बैंक को इग्नोर करके फिर वही गलती तो नहीं करने जा रही कांग्रेस ?
punjabkesari.in Saturday, Jun 27, 2026 - 03:44 PM (IST)
जालंधर(अनिल पाहवा): पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद को लेकर गहमा गहमी चल रही है। पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष राजा वड़िंग को हटाए जाने के लिए काम चल रहा है, बैठकें हो रही हैं, चर्चाएं हो रही हैं लेकिन अभी तक तस्वीर साफ नहीं हुई है कि अध्यक्ष बन कौन रहा है।
इस बीच चर्चा चल रही है कि पंजाब में पार्टी जट्ट सिख चेहरे को हटा कर दोबारा या तो जट्ट सिख चेहरे को ला सकती है या फिर दलित चेहरे पर भी पासा खेल सकती है। इस सब के बीच चाहे हिंदू चेहरे को लेकर कोई चर्चा नहीं चल रही लेकिन पंजाब में कांग्रेस की जो हालत है उसे, किसी खास क्मयुनिटी के चेहरे की तलाश की बजाए ऐसे चेहरे की तलाश करनी होगी जो कांग्रेस को पंजाब से लुप्त होने से बचा सके। cपंजाब में दरअसल भाजपा ने हाल ही में केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश की कमान सौंपी है और यह पहली बार हुआ है कि पार्टी ने हिंदू चेहरे को पीछे कर जट्ट सिख चेहरे पर दांव लगाने की सोची है। अब कांग्रेस में भी अध्यक्ष बदलने को लेकर कई चरह की चर्चाएं हैं लेकिन पार्टी इस सब से ऊपर उठ कर ऐसे चेहरे को आगे नहीं ला पा रही है, जो पार्टी को दोबारा मजबूती दे सके। देश भर में वैसे ही कांग्रेस गिने चुने राज्यों में रह गई है। पंजाब में कांग्रेस के लिए मजबूत संभावनाएं हो सकता हैं, बशर्ते कि वह पुख्ता दांव खेले।
वो लोग जो कांग्रेस की मजबूत नींव रख गए
कांग्रेस के पास ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने पार्टी को फर्श से अर्श तक पहुंचाया। कई सालों तक वो राज्यों के सी.एम. भी रहे। चौधरी बंसी लाल हरियाणा के सी.एम. रहे तथा उन्होंने वहां पर बरसों तक काम किया और कांग्रेस को मजबूत किया। कुछ ऐसा ही काम यशवंत सिंह परमार ने हिमाचल में किया जहां वह सी.एम. तो रहे ही बल्कि उन्हें आर्किटेक्ट ऑफ हिमाचल भी कहा जाता है। पंजाब में भी कांग्रेस के पास प्रताप सिंह कैरों जैसे लोग रहे हैं जिन्होंने पंजाब को तो आगे बढ़ाया ही, साथ ही कांग्रेस को भी दिशा देकर आगे चलाया। हैरानी की बात है कि पंजाब में आज कांग्रेस ऐसे किसी नेता की तलाश की बजाए जट्ट सिख या दलित चेहरों पर दांव खेलने की तैयारी में जुटी है जिसके कारण कांग्रेस पहले ही धीरे धीरे सत्ता से बाहर होती जा रही है। पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि वर्षों तक कांग्रेस के लिए काम करने वाले नेताओं की अनदेखी से संगठन के भीतर असंतोष बढ़ सकता है। उनका मानना है कि चुनाव जैसे महत्वपूर्ण समय में सभी अनुभवी नेताओं को साथ लेकर चलना पार्टी के हित में होगा।
पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की बात करने वाला कोई नहीं
पंजाब में अब राजनीति बदल चुकी है, कांग्रेस का इस राजनीति से अलग थलग पड़ना चिंता का विषय है। पंजाब को लेकर जिस तरह से भाजपा लगातार मजबूत दावे कर रही है तथा सरकार स्थापित करने के दावे कर रही है वहीं कांग्रेस के नेता अपने आप में ही उलझे हुए हैं। ना कोई पंजाब की बात कर रहा है और ना ही कोई पंजाबियत की बात कर रहा है। पंजाब में कांग्रेस पूरी तरह से जट्ट सिख और दलित वोट बैंक पर ही केंद्रित रहती है बेशक राज्य में हिंदू वोट बैंक ने समय समय पर कांग्रेस को सहारा देकर खड़ा किया है। लेकिन कांग्रेस शायद हिंदू वर्ग को मान सम्मान देने में विफल रही है। कांग्रेस में वैसे तो गिने चुने हिंदू चेहरे हैं जिनका पार्टी से पुराना नाता है। सुनील जाखड़ तथा मुनीश तिवारी पार्टी के बड़े हिंदू नेताओं में गिने जाते रहे हैं लेकिन हिंदू वर्ग की अनदेखी के कारण जाखड़ पार्टी से चले गए। उन्हें सी.एम. बनाने को लेकर जिस तरह से पार्टी ने बेरूखी दिखाई, उससे यह बात साफ हो गई कि कांग्रेस हिंदू वर्ग के प्रति अलग रवैया रखती है। कुल मिलाकर अब मुनीश तिवारी पार्टी में हैं जो बड़े हिंदू नेता के तौर पर जाने जाते हैं। सांसद के तौर पर उनका अनुभव भी है और वैसे भी कांग्रेस के आला केंद्रीय नेताओं के साथ भी तिवारी काम कर चुके हैं। शायद उनके अनुभव को देखते हुए ही अप्रेशन सिंदूर के बाद वह ऑल-पार्टी पार्लियामेंट्री डेलीगेशन में भी शामिल थे जिसकी तरफ से विदेशों में भारत के काउंटर-टेरर नैरेटिव को बढ़ाने के लिए भेजा गया था।
हिंदू वर्ग को इग्नोर क्यों करती है कांग्रेस ?
हिंदू वर्ग को कांग्रेस उस समय से दरकिनार करती आई है जब से पंजाब हरियाणा व हिमाचल अलग हुए हैं। 1966 से लगातार पंजाब में जब भी कांग्रेस की सरकार रही, हिंदू नेताओं को उस तरह की तरजीह नहीं मिली जिस तरह से जट्ट सिख या दलित नेताओं को दी गई। बेशक हिंदू वोटर ने खुल कर कांग्रेस का समर्थन किया। इस समय भी पंजाब में कांग्रेस के अध्यक्ष पर राजा वड़िग के तौर पर जट्ट सिख नेता तैनात हैं तो वहीं विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर प्रताप सिंह बाजवा नियुक्त हैं। अगले अध्यक्ष की बात हुई तो फिर से जट्ट सिख नेताओं और दलित नेताओं पर गणना चल रही है। ऐसे में वाजिब है कि हिंदू वोटर को अपने खेमे में करने से एक बार फिर से करने में कांग्रेस चूक सकती है। शायद उस तरह जिस तरह से 2022 के चुनावों में हो चुका है।

