ठीकरीवाला स्कूल विवाद: Roll No रुका, दो पेपर छूटे… अब अचानक क्यों हुआ समझौता?
punjabkesari.in Tuesday, Feb 24, 2026 - 10:07 AM (IST)
बरनाला(विवेक सिंधवानी, रवि): सरकार कोई भी हो, जब किसी मामले में प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारों की जांच के लिए गठित की गई कमेटियों की रिपोर्ट अक्सर बिना किसी नतीजे के ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। कुछ इसी तरह का मामला जिला बरनाला के गाँव ठीकरीवाला के कन्या स्कूल में आठवीं कक्षा की छात्रा दिलप्रीत कौर का रोल नंबर रोके जाने के मामले में घटता दिखाई दे रहा है। स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा हाजिरी कम होने का हवाला देते हुए दिलप्रीत कौर का बोर्ड परीक्षा रोल नंबर जारी नहीं किया गया, जिसके कारण वह 17 और 19 फरवरी को हुई दो महत्वपूर्ण परीक्षाओं में नहीं बैठ सकी। जब मामला मीडिया के जरिए सामने आया, तो शिक्षा बोर्ड के अधिकारी तुरंत हरकत में आए। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने चार शिक्षकों की एक जांच कमेटी गठित की।
धरना, भरोसा और रोल नंबर जारी
घटना से नाराज परिवार 19 फरवरी को डीसी कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गया। देर रात डिप्टी डीईओ और स्कूल प्रिंसिपल ने परिवार को भरोसा दिया कि 20 फरवरी को बच्ची को रोल नंबर जारी कर दिया जाएगा। वादे के मुताबिक 20 फरवरी को रोल नंबर जारी कर दिया गया और बच्ची बाकी परीक्षाओं में बैठ गई। दूसरी ओर, जांच कमेटी भी 20 फरवरी की सुबह ठीकरीवाला स्कूल पहुंची और सभी संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए। जब कमेटी ने छात्रा के पिता से बयान के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि वह डीईओ कार्यालय आकर ही बयान देंगे। इसके बाद शाम को पिता द्वारा कमेटी को लिखित बयान दिया गया कि वे प्रिंसिपल के खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं, क्योंकि रोल नंबर रुकने के कारण बच्ची दो पेपरों से वंचित रही और परिवार को मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी। जांच के दौरान एक नया मोड़ तब आया जब छात्रा के पिता ने दावा किया कि 20 फरवरी को रोल नंबर जारी करने के बाद स्कूल प्रिंसिपल ने उनसे खाली कागज पर अंगूठा लगवा लिया था। बाद में उन्होंने स्कूल की ही एक अन्य छात्रा से वहां यह लिखवा लिया कि "अब हमारा समझौता हो गया है, हम कोई कार्रवाई नहीं करवाना चाहते।" जब यह जानकारी जिला शिक्षा अधिकारियों के ध्यान में आई, तो प्रिंसिपल के विरुद्ध पहले से चल रहे सवाल और गंभीर हो गए।
दो दिन जांच क्यों रुकी?
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, 20 फरवरी की रात डीईओ कार्यालय में छात्रा के परिवार, प्रिंसिपल, दोनों शिक्षा अधिकारियों और कमेटी सदस्यों की मौजूदगी में लंबी चर्चा चलती रही। आखिर में छात्रा के पिता ने कार्रवाई करवाने संबंधी लिखित बयान दे दिया। परंतु शनिवार और रविवार की छुट्टियों के नाम पर जांच रोक दी गई, जिस दौरान प्रिंसिपल को परिवार से संपर्क करने का काफी समय मिल गया। परिणामस्वरूप, 23 फरवरी को छात्रा के पिता ने एक हलफनामे (अश्टाम) पर लिख कर दे दिया कि वे अब कोई कार्रवाई नहीं करवाना चाहते।
यहां मुख्य सवाल उठते हैं—
जब बयान 20 फरवरी को ही ले लिया गया था, तो जांच रोकने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या उच्च स्तरीय जांच छुट्टियों का बहाना लेकर रोकी जा सकती है?
क्या प्रिंसिपल को बचाने के लिए जानबूझकर जांच रोकी गई?
दो दिन तक कार्रवाई की मांग करने वाले परिवार ने अचानक समझौता किन परिस्थितियों में लिखा?
जांच का असली विषय और कमेटी की दिशा
सेवानिवृत्त शिक्षा अधिकारियों के मुताबिक, जांच का मुख्य विषय सिर्फ यह था कि क्या हाजिरी कम होने के नियमों के तहत रोल नंबर रोका गया था या नहीं? यदि नियमों के अनुसार ही कार्रवाई हुई थी, तो बोर्ड और शिक्षा विभाग को बेवजह सवालों के घेरे में क्यों लाया गया? अब सबकी निगाहें जांच कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं, क्योंकि कमेटी में वे शिक्षक शामिल किए गए थे जिनकी छवि साफ-सुथरी मानी जाती है। लेकिन यहाँ नया सवाल यह है कि: कमेटी 20 फरवरी को दिए गए बयान को मानेगी या 23 फरवरी वाले ‘समझौते’ को? क्या कमेटी के पास हलफनामे (अश्टाम) पर लिखे राजीनामे को जांच का हिस्सा बनाने की विभागीय मंजूरी है? यदि कमेटी पहले दिए गए बयान के आधार पर प्रिंसिपल के खिलाफ रिपोर्ट तैयार करती है, तो क्या जिला शिक्षा अधिकारी समझौते के आधार पर इस रिपोर्ट को रद्द करने का अधिकार रखते हैं? अगर ऐसा होता है, तो जांच कमेटी का गठन ही सवालों के घेरे में आ जाएगा। यह मामला शिक्षा विभाग के जांच के तरीकों, पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल छोड़ गया है। अब देखना यह है कि जांच कमेटी सच्चाई को किस हद तक उजागर करती है और जिला शिक्षा अधिकारी अंतिम फैसला किस आधार पर लेते हैं।

