मोहाली के गांव में Holi की अनोखी परंपरा, घरों-दुकानों पर हड्डियां और उड़ती श्मशान की राख...

punjabkesari.in Wednesday, Mar 04, 2026 - 12:01 PM (IST)

पंजाब डेस्क : आज जहां पूरे देशभर में रंगों से होली खेली जा रही है वहीं मोहाली में एक अनोखे तरीके से होली खेलने की परंपरा है। आपको बता दें कि ये अनोखी परंपरा मोहाली के पास स्थित सोहाना गांव की हैं जहां होली का रंग देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। जहां पूरे देश में रंगों और गुलाल से त्योहार मनाया जाता है, वहीं इस गांव में वर्षों पुरानी एक विशेष परंपरा के तहत श्मशान से जुड़ी सामग्री का उपयोग किए जाने की बात सामने आती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, लगभग दो सदियों (200 साल) से चली आ रही इस परंपरा में होली से पहले कुछ तत्व सड़कों और दुकानों के आसपास दिखाई देते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि त्योहार से एक दिन पहले हड्डियां और अन्य सामग्री रखी जाती है, जिसके बाद सुबह के समय लोग स्वयं सफाई करते हैं। हालांकि यह सब किसकी ओर से और किस उद्देश्य से किया जाता है, इस बारे में स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है। श्मशान की राख और पशुओं की हड्डियों से होली मनाने की परंपरा है। 

गांव की इस परंपरा का कोई आधिकारिक दस्तावेजी इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय मान्यताओं के आधार पर इसे आगे बढ़ाया जा रहा है। समय के साथ यह परंपरा चर्चा का विषय भी बनी है। स्थिति को देखते हुए पुलिस प्रशासन होली के दिन सतर्क रहता है ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो। गांव वासियों का कहना है कि, ये राख कौन फेंकता है और हड्डियां-कंकाल कौन टांग देता है इसके बारे में आज तक किसी को कुछ पता नहीं चल पाया है। CRPF के जवानों को भी इसका पता नहीं चल पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले त्योहार के दौरान हालात ऐसे हो जाते थे कि लोगों को आवाजाही में दिक्कत होती थी, लेकिन अब व्यवस्था पहले से बेहतर है। इसके बावजूद कुछ लोग इस दिन गांव में आने से बचते हैं।  

गांव वासियों का कहना है कि होली से पहले रात के समय कुछ अज्ञात लोग घरों व दुकानों के बाहर जानवरों की हड्डियां टांग जाते हैं। यही नहीं सड़कों पर भी जानवरों की हड्डियां फैली हुई मिलती है। लोगों ने बताया कि पहले के समय तो सभी गली और सड़कों पर हड्डियां ही हड्डियां बिखरी पड़ी होती थी जिस कारण लोगों का गुजरना मुश्किल हो जाता था। मतलब कि इस गांव का दृश्य डरावना होता है। इस संबंधी जानकारी देते हुए इलाके के पार्षद हरजीत सिंह ने बताया कि, गांव सोहना की होली पूरे देश में जानी जाती है। उन्होंने बताया कि, एक दिन CRPF के 20-25 जवान लाइन बनाकर जा रहे थे। लेकिन उन्हें भी समझ नहीं आया है कि, राख कहां से आकर उन पर गिर रही है। 

सोहाना गांव के 62 वर्षीय शिक्षाविद सुंदर अग्रवाल बताते हैं कि पहले होली का स्वरूप आज से काफी अलग था। उनके मुताबिक, लोग श्मशान से राख लाकर रात में उसे छानते थे और सुबह एक-दूसरे पर डालते थे। कुछ शरारती तत्व नालियों की गंदगी तक इस्तेमाल कर लेते थे। बुजुर्गों में यह मान्यता प्रचलित थी कि यदि इस तरह होली न मनाई जाए तो बाजार में कारोबार प्रभावित होता है। इसी सोच के चलते कई दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर हड्डियां-कंकाल तक टंगवाते थे। वह बताते हैं कि समय के साथ हालात बदले हैं। सीवरेज व्यवस्था बनने और शहरीकरण बढ़ने से यह परंपरा काफी कमजोर पड़ी है। अब बाजार में लगभग 25 प्रतिशत लोग ही इस तरीके से होली मनाते हैं, जबकि अधिकांश लोग पारंपरिक रंगों से त्योहार मनाना या सामान्य रूप से खरीदारी करना पसंद करते हैं। गौरतलब है कि मोहाली के अंतर्गत आने वाला सोहाना गांव अब नगर निगम के दायरे में है। यहां आधुनिक कोठियां, शैक्षणिक संस्थान और विकसित बाजार मौजूद हैं। इसके बावजूद वर्षों पुरानी यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, हालांकि पहले की तुलना में इसका प्रभाव और दायरा काफी सीमित हो चुका है।

वहीं इस परंपरा को लेकर अलग-अलग तरह की मान्यताएं हैं, जैसे कि कुछ लोग इसे गरीबी या किसी श्राप को दूर करने की बात कर रहे हैं। कई लोग हड्डियां-कंकाल टांगने से बुरी नजर मौत और दुर्भाग्य दूर, कईयों का तो कहना है कि पहले रंग महंगे होते इसलिए चूल्हे की राख से होली खेलने की परंपरा बन गई और धीरे-धीरे ये श्मशान की राख में बदल गई। वहीं गांव वासियों का कहना है कि अगर ऐसे होली नहीं खेली तो उनका नुकसान होगा। ऐसे में आपको बता दें कि, मोहाली के गांव सोहाना में अब 2 तरहों की होली खेली जाती है एक श्मशान की राख और दूसरी रंगों से। 

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News Editor

Kamini

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