लाहौर में सिख विरासत की वापसी! 80 साल बाद बंद पड़े गुरुद्वारा में फिर गूंजी अरदास
punjabkesari.in Friday, Feb 13, 2026 - 07:46 PM (IST)
लाहौर
लाहौर के मॉल रोड स्थित Aitchison College परिसर में स्थित प्राचीन गुरुद्वारा साहिब में करीब 80 वर्षों बाद ऐतिहासिक और भावनात्मक सिख शब्द कीर्तन और अरदास का आयोजन किया गया। यह समागम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि विभाजन से पहले की सांझी विरासत की यादों को भी ताज़ा कर गया।
इस अवसर पर पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और Pakistan Sikh Gurdwara Prabandhak Committee के अध्यक्ष Ramesh Singh Arora सहित स्थानीय सिख संगत, विद्वान हस्तियां और कॉलेज प्रशासन के सदस्य उपस्थित रहे।
डॉ. तरुणजीत सिंह बुतालिया ने बताया कि कॉलेज प्रशासन के सहयोग से यह विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्थानीय रागी जत्थे के सदस्यों हरविंदर सिंह, अक्षयदीप सिंह और दलीप सिंह ने गुरबाणी के पवित्र शब्दों का भावपूर्ण कीर्तन किया, जिसने उपस्थित संगत को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया।
उल्लेखनीय है कि 1947 के विभाजन के बाद सिख विद्यार्थियों की कमी के कारण गुरुद्वारा साहिब बंद हो गया था, हालांकि इसकी देखभाल कॉलेज प्रशासन द्वारा लगातार की जाती रही। यह कीर्तन कॉलेज की 140वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया।

गौरतलब है कि कॉलेज की स्थापना 3 नवंबर 1886 को अविभाजित पंजाब के शाही और प्रतिष्ठित परिवारों को उच्च शिक्षा देने के उद्देश्य से की गई थी। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, गुरुद्वारा साहिब का नक्शा तत्कालीन मेयो स्कूल ऑफ आर्ट्स (वर्तमान National College of Arts) के प्रसिद्ध सिख वास्तुकार सरदार राम सिंह द्वारा तैयार किया गया था।
इस गुरुद्वारा साहिब की नींव वर्ष 1910 में Maharaja Bhupinder Singh (पटियाला) द्वारा रखी गई थी, जो 1904 से 1908 तक इस कॉलेज के छात्र भी रहे। अगले दो वर्षों में गुरुद्वारा भवन का निर्माण पूरा हुआ और इसे एक सक्रिय धार्मिक स्थल के रूप में समर्पित किया गया, जहां सिख विद्यार्थी प्रतिदिन शाम को कीर्तन और अरदास में भाग लेते थे।
वर्तमान में कॉलेज के लगभग 15 सिख पूर्व छात्र भारत में रह रहे हैं। उन्होंने काले-सफेद संगमरमर की फर्श और किले जैसी आंतरिक बनावट वाले इस गुरुद्वारा साहिब से जुड़ी अपनी पुरानी यादें साझा कीं। गुरुद्वारे के अलावा कॉलेज परिसर में विभाजन से पहले की एक मस्जिद और एक हिंदू मंदिर भी आज तक मौजूद हैं, जो उस दौर की सांझी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं।

