पंजाब के स्कूलों के लिए आदेश जारी, बारिशों के बीच विभाग ने दी नई हिदायतें
punjabkesari.in Thursday, Jul 09, 2026 - 11:04 AM (IST)
लुधियाना (विक्की): पंजाब सरकार और स्कूल शिक्षा विभाग की लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है जहां मानसून का सीजन पूरी तरह से शुरू होने के बाद अब अधिकारियों की नींद टूटी है। विभाग द्वारा स्कूलों में बरसात से बचाव और प्रबंधों को लेकर अब गाइडलाइंस जारी की जा रही हैं और रिकॉर्ड मांगे जा रहे हैं। शिक्षा विभाग के इस ढीले रवैये और गैर-जिम्मेदाराना नीति के खिलाफ अध्यापकों में भारी रोष है।
अध्यापकों का साफ कहना है कि जो सुरक्षा प्रबंध और तैयारियों से जुड़े काम मार्च और अप्रैल के तपते महीनों में एडवांस में हो जाने चाहिए थे, उनके लिए अब पत्र जारी कर जानकारी मांगी जा रही है जब सिर पर मानसून आ चुका है। अध्यापकों के अनुसार, पंजाब सरकार और उसके बड़े अधिकारी जमीनी हकीकत से पूरी तरह दूर हैं और यह सब जमीनी काम करने के बजाय केवल कागजी खानापूर्ति करने में जुटे हैं। अगर इस लापरवाही के कारण स्कूलों में कोई अप्रिय घटना या बड़ा हादसा होता है तो इसके लिए सीधे तौर पर शिक्षा विभाग के अधिकारी और पंजाब सरकार जिम्मेदार होगी। अधिकारी केवल अपनी खाल बचाने और जिम्मेदारी से भागने के लिए ऐन वक्त पर ऐसे फरमान सुना रहे हैं ताकि सारा दोष जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्टाफ के सिर मढ़ा जा सके।
मार्च-अप्रैल के काम अब सौंप कर अधिकारियों ने झाड़ा पल्ला
गौरतलब है कि दफ्तर डायरैक्टर स्कूल शिक्षा (सैकेंडरी ), पंजाब की ओर से सभी जिला शिक्षा अफसरों को पत्र जारी कर बरसात के मौसम में स्कूलों की इमारतों और विद्यार्थियों की सेहत संभाल संबंधी गाइडलाइंस जारी की गई हैं। इन निर्देशों में साफ लिखा है कि स्कूलों की छतों और पानी की पाइपों की सफाई करवाई जाए, पानी के टैंकों को साफ किया जाए और स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे लाइब्रेरी, क्लासरूम व लैब की दरारों को तुरंत ठीक करवाया जाए ताकि कीड़े-मकोड़े न पनप सकें।
अध्यापकों का तर्क है कि सरकार और विभाग के आला अफसरों को यह बुनियादी बात समझनी चाहिए कि छतों की सफाई, दरारें भरने और पानी की टंकियां साफ करने का काम कड़कती धूप वाले महीनों यानी मार्च और अप्रैल में सही ढंग से हो सकता है। अब जब हर तरफ मूसलाधार बारिश हो रही है, तब छतों पर चढ़कर मुरम्मत करवाना और टंकियां साफ करवाना न सिर्फ मुश्किल है बल्कि जानलेवा भी है। विभाग ने समय रहते बजट और संसाधन जारी नहीं किए और अब अपनी नाकामी छुपाने के लिए स्कूलों को सूचियों में उलझा दिया है।
ऐन मानसून में जानकारी देने से भी नहीं सुधरेंगे हालात
अध्यापकों का यह भी कहना है कि यदि अब विभाग के दबाव में आकर स्कूलों द्वारा आनन-फानन में यह सारी जानकारी दे भी दी जाए, तो भी इसका इस सीजन में कोई फायदा नहीं होने वाला। अब जब मानसून पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और स्कूल परिसरों में पानी जमा होने लगा है, तब कागजों पर कमियां गिनाने या रिपोर्ट भेजने से धरातल पर स्थितियां नहीं बदलेंगी।
बारिश के बीच न तो भवनों की मरम्मत संभव है और न ही जलभराव की समस्या का तुरंत कोई बड़ा समाधान निकाला जा सकता है। अध्यापकों के अनुसार, जानकारी जुटाने का यह नाटक सिर्फ फाइलों का पेट भरने के लिए किया जा रहा है, ताकि विभाग यह दिखा सके कि वह काम कर रहा है, जबकि असलियत में इस समय ऐसी रिपोर्टिंग का कोई व्यावहारिक लाभ विद्यार्थियों या अध्यापकों को नहीं मिलने वाला।
जमीनी हकीकत से दूर अफसरों ने ग्राऊंड स्टाफ पर मढ़ी सारी जिम्मेदारी
इस सरकारी पत्र में विभाग ने यह भी हुक्म जारी किया है कि स्कूलों के ग्राऊंड और आसपास इकट्ठा हुए पानी की निकासी के पुख्ता प्रबंध किए जाएं, बिजली के उपकरण सही हालत में रखे जाएं, लटकती व नंगी तारों को ठीक किया जाए और मच्छरों से बचाव के लिए फॉगिंग करवाई जाए। इस पर रोष जताते हुए अध्यापक वर्ग ने कहा कि सरकार केवल कागजों पर आदेश जारी करना जानती है। असलियत में ग्राउंड लेवल पर न तो फॉगिंग के लिए कोई ग्रांट दी गई है और न ही लटकती तारों को ठीक करने के लिए बिजली विभाग का कोई सहयोग मिल रहा है। स्कूलों में फर्स्ट ऐड किट उपलब्ध रखने और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के स्कूलों को खुद ही इवेकुएशन प्लान तैयार करने के निर्देश देकर अफसरों ने सारा बोझ अध्यापकों पर डाल दिया है। अध्यापकों का आरोप है कि यह पूरी कवायद सिर्फ इसलिए की जा रही है ताकि कल को अगर बारिश या शॉर्ट सर्किट से कोई हादसा हो जाए, तो अधिकारी यह पत्र दिखाकर कह सकें कि हमने तो पहले ही लिख दिया था।
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