"गरीब की ढाल बनी अमीर की तलवार", सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर बरनाला में मॉर्निंग टेबल पर मंथन
punjabkesari.in Wednesday, May 06, 2026 - 09:36 AM (IST)
बरनाला(विवेक सिंधवानी, रवि) : देश की सर्वोच्च अदालत ने जो बात कही, वही बात आज सुबह बरनाला क्लब की मॉर्निंग टेबल पर आम नागरिकों की जुबान पर थी। फर्क सिर्फ इतना था कि अदालत ने कानूनी भाषा में कहा और यहां चाय की चुस्कियों के बीच दिल की गहराइयों से कहा गया। माननीय सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी कि जनहित याचिका अब "जनहित" नहीं बल्कि "पैसा हित याचिका" बन चुकी है बरनाला के जागरूक नागरिकों के दिलों को छू गई और एक लंबी, गहरी और बेबाक चर्चा का सबब बनी।
जब आम आदमी की उम्मीद बन गई हथियार
चर्चा की शुरुआत नगर कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष मक्खन शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि पी आई एल यानी जनहित याचिका भारतीय लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत देन थी। 1980 के दशक में जब इसकी शुरुआत हुई, तब इसका एकमात्र मकसद था ,उन लोगों को न्याय दिलाना जो खुद अदालत तक नहीं पहुंच सकते। बंधुआ मजदूर, जेलों में सड़ते विचाराधीन कैदी, फुटपाथ पर रहने वाले बच्चे इन सबके लिए पी आई एल एक वरदान था। लेकिन आज? आज यही वरदान अभिशाप बनता जा रहा है। मक्खन शर्मा ने तल्ख लहजे में कहा "जिस औजार को गरीब के हाथ में देकर न्याय का रास्ता खोला गया था, उसी औजार को आज पैसे वाले, रसूखदार और चालाक लोगों ने छीन लिया है। अब पी आई एल गरीब की ढाल नहीं, अमीर की तलवार बन गई है।
व्यापार, राजनीति और बदले की भावना — पी आई एल का नया चेहरा
अजय मित्तल पप्पू टल्लेवालिया ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू उठाया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में पी आई एल तीन कारणों से दायर होती है — पहला, प्रतिस्पर्धी व्यापारी को परेशान करने के लिए; दूसरा, राजनीतिक विरोधी को घेरने के लिए; और तीसरा, मीडिया में सुर्खियां बटोरने के लिए। इन तीनों में से किसी में भी जनहित की बू तक नहीं आती। उन्होंने कहा — "जब पी आई एल दायर करने वाले को खुद कोई तकलीफ नहीं, कोई नुकसान नहीं, तो फिर वो जनहित कैसा? यह तो निजी हित की याचिका है, बस लबादा जनहित का ओढ़ा हुआ है।"
न्यायपालिका पर बढ़ता बोझ — असली पीड़ित को देरी
सिग्मा कॉलोनी के अध्यक्ष संजय कुमार ने आंकड़ों की भाषा में बात रखी। उन्होंने कहा कि देश की अदालतों में पहले से करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। ऐसे में जब स्वार्थ से प्रेरित पी आई एल दायर होती हैं तो न्यायाधीशों का कीमती समय बर्बाद होता है। जो समय किसी गरीब की जमीन बचाने में लगना चाहिए, वो किसी रईस की व्यावसायिक दुश्मनी सुलझाने में खर्च हो जाता है। संजय कुमार ने मांग की कि पी आई एल दायर करने से पहले एक स्वतंत्र स्क्रीनिंग कमेटी बनाई जाए जो याचिका की मंशा परखे।
पी आई एल के जनक का सपना हो रहा है धुंधला
अग्रवाल सभा के सरपरस्त प्यारालाल रायसरिया ने भावुक होते हुए कहा कि न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने जब पी आई एल की नींव रखी थी, तब उनकी आंखों में एक सपना था — एक ऐसा भारत जहां न्याय केवल अमीरों की बपौती न हो। उस सपने को आज बाजार में बेचा जा रहा है। उन्होंने कहा पी आई एल को बचाना है तो उसके दुरुपयोग को रोकना होगा, वरना एक दिन ऐसा आएगा जब असली पीड़ित पी आई एल दायर करेगा और अदालत उसे भी शक की नजर से देखेगी।
जुर्माना हो, तब रुकेगा खेल
कृष्ण कुमार बिट्टू और सतीश चीमा ने एक व्यावहारिक सुझाव दिया। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि जो पी आई एल स्पष्ट रूप से स्वार्थ से प्रेरित पाई जाए, उस पर याचिकाकर्ता पर इतना भारी जुर्माना लगाया जाए कि दोबारा कोई ऐसी हिम्मत न करे। अभी जुर्माने का प्रावधान है लेकिन वो नाममात्र का है। जब तक जुर्माना दर्दनाक नहीं होगा, यह खेल बंद नहीं होगा।
मीडिया की भूमिका पर भी उठे सवाल
गगन सोहल और उमेश बंसल ने एक नया और महत्वपूर्ण आयाम जोड़ा। उन्होंने कहा कि कई बार फर्जी पी आई एल इसलिए दायर होती हैं क्योंकि मीडिया उन्हें बिना जांचे-परखे बड़ी खबर बना देता है। पी आई एल दायर हुई नहीं कि टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो जाती है। याचिकाकर्ता रातोंरात "समाजसेवी" बन जाता है। उन्होंने कहा कि मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और पी आई एल की खबर देने से पहले उसकी मंशा पर सवाल उठाने होंगे।
कानूनी ढांचे की मांग
राजीव जैन ने कहा कि पी आई एल के लिए अब एक स्पष्ट, कड़ा और पारदर्शी कानूनी ढांचा बनाने का वक्त आ गया है। याचिकाकर्ता की पहचान, उसका जनहित से संबंध, और याचिका की प्रामाणिकता — इन सब पर पहले दिन से ही सवाल होने चाहिए।
पी आई एल बचाओ, लोकतंत्र बचाओ
कुलतार तारी और विजय गोयल ने चर्चा का समापन करते हुए एक सूत्र वाक्य दिया पी आई एल बचेगी तो लोकतंत्र बचेगा, पी आई एल बिकेगी तो न्याय मरेगा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल न्यायिक टिप्पणी नहीं है यह पूरे समाज के लिए एक आत्मचिंतन का निमंत्रण है। हम सबको मिलकर तय करना होगा कि पी आई एल को जनता की ताकत बनाए रखना है या किसी की दुकान बनने देना है।
बरनाला क्लब की यह मॉर्निंग टेबल आज महज एक चर्चा का मंच नहीं थी यह उस जागरूक नागरिक समाज की आवाज़ थी जो न्याय व्यवस्था की पवित्रता को बचाने के लिए चिंतित है।

