Punjab : छोटी क्लास की किताबें बनी कमर तोड़ बोझ, पेरैंट्स ने खटखटाए सियासी दरवाजे!

punjabkesari.in Friday, Apr 03, 2026 - 11:37 AM (IST)

लुधियाना (विक्की): जिन पेरैंट्स ने पिछले समय में कभी पूरे 5 से 7 हजार के बीच अपनी ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की होगी, उन्होंने कभी यह नहीं सोचा होगा कि जब वे अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाएंगे तो उनकी पहली से तीसरी क्लास का बुक सैट भी 4 से 5 हजार रुपए का आएगा।

यही हो रहा है देशभर के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पेरैंट्स के साथ जिनको अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के लिए न सिर्फ मोटी फीस अदा करनी पड़ रही है बल्कि एनुअल चार्ज और महंगी बुक्स के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ रही है। यह मामला इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है और पेरैंट्स अपने बच्चों के बुक सैट खरीदने के बाद उसकी किताबों को दिखाकर सैट का रेट बताते हैं तो कमैंट बॉक्स में प्रतिक्रिया देने वालों की लाइन लग जाती है।

Expensive Books

जब कोई राज्य सरकार निजी स्कूलों और प्राइवेट पब्लिशर्स की सैटिंग तोड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही तो अभिभावकों को देश की लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के दरवाजों का रुख करना पड़ रहा है। पेरैंट्स सोशल मीडिया पर नेता विपक्ष राहुल गांधी, राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को महंगी किताबों का मुद्दा दोनों सदनों में उठाने की गुहार लगा रहे हैं ताकि केंद्र सरकार कोई नीति बनाए।

जानकारी के मुताबिक प्राइवेट स्कूलों में नया सैशन शुरू होते ही हर साल किताबों के आसमान छूते दाम अभिभावकों के होश उड़ा देते हैं। किताबों के सैट का रेट जानकर पेरैंट्स एक बार तो घबरा जाते हैं लेकिन उनको मजबूरी में जेब ढीली करनी पड़ती है। शिक्षा, जो कभी संस्कार और ज्ञान का माध्यम थी, अब पूरी तरह से मुनाफे के व्यापार में तबदील हो चुकी है। किताबों के सैट खरीदने पहुंचे विद्यार्थी और उनके माता-पिता बिल देखकर स्तब्ध हैं।

private school

स्थिति यह है कि छोटी कक्षाओं की किताबों की कीमत भी हजारों में वसूली जा रही है। स्कूल प्रबंधन और पब्लिशर्स के बीच चल रहे इस ‘कमीशन के खेल’ ने मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। इसने समाज के बड़े वर्ग को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भविष्य में साधारण परिवार का बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएगा? इस मुनाफाखोरी के खिलाफ अब अभिभावकों का गुस्सा सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक फूटने लगा है।

वायरल वीडियो में शिक्षा को बताया ‘लग्जरी’

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में महिला ने अपना दर्द बयां किया है। महिला ने वीडियो में अपनी बेटी की कक्षा 4 की किताबें और कॉपियां दिखाते हुए बताया कि मात्र 4-5 किताबों (हिंदी, मैथ, एटलस, इंगलिश और कम्प्यूटर) तथा 8 कॉपियों के सैट के लिए उन्हें 3,298 रुपए चुकाने पड़े। महिला ने कहा कि जब वह बी.एससी. कर रही थीं, तब यूनिवर्सिटी की पूरे साल की फीस केवल 2,700 रुपए थी। आज चौथी कक्षा की किताबों का खर्च एक समय की कॉलेज फीस से भी ज्यादा हो गया है।

एन.सी.ई.आर.टी. को दरकिनार कर पब्लिशर्स की चांदी

किताबों के इस महंगे होने के पीछे का असली खेल प्राइवेट पब्लिशर्स और स्कूलों की सांठ-गांठ है। हालांकि सी.बी.एस.ई. ने साफ निर्देश दे रखे हैं कि स्कूलों में केवल एन.सी.ई.आर.टी. की किताबें ही लगानी चाहिएं जिनकी कीमत काफी कम होती है। इसके बावजूद प्राइवेट स्कूल प्रबंधन मोटी कमीशन के लालच में प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें जबरन लगवा रहे हैं। यह मुनाफाखोरी का खेल इतना व्यवस्थित है कि हर साल किताबों के एडीशन बदल दिए जाते हैं, ताकि पुराने बच्चों की किताबें नए बच्चों के काम न आ सकें। पब्लिशर्स स्कूलों को 40 से 50 प्रतिशत तक कमीशन का ऑफर देते हैं जिसका बोझ अभिभावकों पर पड़ता है।

हालात ये हैं कि अलग-अलग स्कूलों का बुक सैट अलग-अलग रेटों में मिल रहा है। लुधियाना की बात करें तो यहां प्रमुख स्कूलों के बुक सैट तो फिर भी पेरैंट्स की रेंज में हैं जबकि जिन स्कूलों ने अपने बुक वैंडर बदले हैं, उनके पेरैंट्स को कक्षा दूसरी से लेकर 8वीं तक का बुक सैट 5 से 8 हजार में मिल रहा है।

अभिभावकों का कहना है कि सरकारों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है और स्कूल बेखौफ होकर पेरैंट्स को लूट रहे हैं। पोस्ट के नीचे कमैंट्स की बाढ़ आ गई है, जहां डॉ. संजीवनी शर्मा ने लिखा कि उन्होंने कक्षा 4 के लिए 7,000 रुपए दिए, वहीं बिंदिया शर्मा ने कक्षा 8 के लिए 5,400 रुपए चुकाने की बात कही। एक सोशल मीडिया यूजर ने राघव चड्ढा से आवाज उठाने की अपील की, जबकि एक यूजर ने सवाल किया कि 5वीं क्लास की 12 किताबों के लिए 7,999 रुपए लेना कितना जायज है?

सौरभ नामक यूजर ने बताया कि उनके बेटे की पहली क्लास का सैट 11,000 रुपए का आया है। एक अन्य यूजर ने कहा कि वहां दूसरी कक्षा की किताबों के लिए 6,500 रुपए लिए जा रहे हैं। रूबीना नंदा ने आरोप लगाया कि सरकारी स्कूलों को जानबूझकर खराब किया गया है ताकि प्राइवेट संस्थान फल-फूल सकें।

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News Editor

Urmila

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