1992 में टूटा इतिहास का बंधन, भारतीय सेना में महिलाओं के लिए कल के दिन ही खुले थे अफ़सरी के द्वार
punjabkesari.in Thursday, Jan 29, 2026 - 11:05 PM (IST)
जालंधर (कशिश): 30 जनवरी 1992 भारतीय सेना के इतिहास में एक ऐसा दिन है, जब महिलाओं के लिए वर्दी पहनने का सपना हकीकत बना। इस दिन केंद्र सरकार ने Women Special Entry Scheme (WSES) लागू की, जिसके तहत महिलाओं को पहली बार भारतीय सेना में गैर-मेडिकल अफ़सर के रूप में शामिल होने का अवसर मिला। यह फैसला न केवल सेना, बल्कि समाज के लिए भी एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।
पहले महिलाओं की भूमिका सेना में सीमित थी—वे केवल नर्सिंग और मेडिकल सेवाओं तक ही शामिल थीं। 1992 के फैसले के बाद महिलाएँ अब आर्मी एजुकेशन कोर, सिग्नल्स, इंटेलिजेंस, ऑर्डनेंस और JAG जैसी शाखाओं में भी सेवाएँ दे सकती हैं।
पहली महिला अफ़सर और बदला नजरिया
1992 में ही प्रिया झिंगन भारतीय सेना की पहली महिला अफ़सर बनीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में महिलाओं की क्षमता को साबित किया। धीरे-धीरे समाज और सेना—दोनों का नजरिया बदलता गया और महिलाओं की भागीदारी बढ़ती चली गई।
शुरुआत में महिलाओं को केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) दिया गया, जिसकी अवधि सीमित थी। वर्षों तक चले कानूनी और सामाजिक संघर्ष के बाद 2020 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश से महिलाओं को Permanent Commission का अधिकार मिला। इसके बाद वे पुरुष अधिकारियों की तरह पूरी सेवा अवधि तक सेना में रह सकती हैं।
आज हालात यह हैं कि महिलाएँ केवल सेना में अफ़सर ही नहीं बन रहीं, बल्कि NDA (नेशनल डिफेंस अकादमी) में भी प्रवेश लेकर थलसेना, नौसेना और वायुसेना—तीनों में नेतृत्व के लिए तैयार हो रही हैं। यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र और समानता की सोच का प्रतीक माना जा रहा है। भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की शहादत की बात करें तो यह संख्या बहुत कम है, लेकिन उनका बलिदान उतना ही महान है।
24 मार्च 2015 को भारतीय नौसेना की अधिकारी लेफ्टिनेंट किरण शेखावत गोवा तट के पास डॉर्नियर विमान दुर्घटना में ड्यूटी के दौरान शहीद हो गईं। वे भारतीय नौसेना की पहली महिला अधिकारी थीं जिन्होंने सेवा के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी। उनका बलिदान यह साबित करता है कि देश की बेटियाँ भी राष्ट्र रक्षा में किसी से कम नहीं।
सेना में महिला शहीदों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन हर महिला सैनिक का योगदान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने न केवल सीमाओं की रक्षा की, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की बेटियों के लिए रास्ते भी खोले।

