पुलिस कस्टडी में हुई दीपक शुक्ला की मौत का मामला: 6 साल बाद अदालत ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

punjabkesari.in Tuesday, Apr 07, 2026 - 01:19 PM (IST)

लुधियाना (राज): करीब छह साल पहले रिकवरी एजेंट दीपक शुक्ला की थाना डिविजन नंबर 5 की पुलिस हिरासत में हुई मौत के मामले में लुधियाना की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या  के तहत आरोप तय करने के आदेश जारी किए हैं। जिन पुलिसकर्मियों पर अब 'कत्ल' का मुकदमा चलेगा, उनमें महिला सब-इंस्पेक्टर ऋचा शर्मा (तत्कालीन SHO), एएसआई जसकरण सिंह (तत्कालीन चौकी प्रभारी कोचर मार्केट), एएसआई चरणजीत सिंह और कांस्टेबल जुगनू शामिल हैं। खास बात यह है कि कांस्टेबल जुगनू का नाम पहले एफआईआर में नहीं था, लेकिन अदालत ने अब उसे भी आरोपी के तौर पर नामजद करने के निर्देश दिए हैं।

यह पूरा मामला फरवरी 2020 का है, जब पुलिस ने दीपक शुक्ला को वाहन चोरी के एक मामले में हिरासत में लिया था। परिवार का आरोप है कि दीपक और उसकी पत्नी प्रीति को 15 फरवरी को नाजायज तरीके से उठाया गया था। पुलिस ने कथित तौर पर उन्हें छोड़ने के बदले 1.25 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। जब परिवार पूरी रकम नहीं दे पाया, तो पुलिस ने महज 25 हजार रुपये लेकर प्रीति को तो छोड़ दिया, लेकिन दीपक पर चोरी का झूठा मामला दर्ज कर उसे अमानवीय यातनाएं दीं। अदालत में पेशी के दौरान भी दीपक की हालत बेहद खराब थी और जेल में जब उसके पिता विनोद शुक्ला उससे मिलने पहुंचे, तो वह खून की उल्टियां कर रहा था। 26 फरवरी 2020 की रात दीपक ने दम तोड़ दिया, जिसके बाद पुलिसिया तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

दरअसल, अदालत का यह फैसला मेडिकल रिपोर्ट और न्यायिक जांच के आधार पर आया है। जगराओं की सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ. गुरबिंदर कौर की गवाही इस मामले में टर्निंग पॉइंट साबित हुई। उन्होंने बताया कि दीपक के शरीर पर चोटों के 7 गहरे निशान थे, जो मौत से पहले दिए गए थे। इन चोटों ने उसके फेफड़ों, गुर्दे और दिल पर सीधा असर डाला, जिससे उसकी जान गई। न्यायिक मजिस्ट्रेट पलविंदर सिंह की जांच रिपोर्ट में भी पुलिस की भूमिका को संदिग्ध पाया गया था।

दीपक के परिवार ने इंसाफ के लिए एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ी है। शुरुआत में पुलिस ने इस मामले को दबाने की कोशिश की, लेकिन अदालत के हस्तक्षेप के बाद पहले गैर-इरादतन हत्या (धारा 304) का मामला दर्ज हुआ था। परिवार इस पर संतुष्ट नहीं था और लगातार हत्या की धारा जोड़ने की मांग कर रहा था। अब अदालत ने आईपीसी की धारा 302, 166, 166-ए और 34 के तहत आरोप तय करने के आदेश देकर यह साफ कर दिया है कि कानून की नजर में कोई भी वर्दीधारी दोषी कानून से ऊपर नहीं है। इस फैसले के बाद उन पुलिसकर्मियों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि कुछ तो अब तक सस्पेंशन के बाद बहाल होकर ड्यूटी भी कर रहे थे। अब उन्हें जेल की सलाखों के पीछे जाने का डर सताने लगा है।

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News Editor

Kalash

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