संगरूर लोकसभा चुनाव : सिमरनजीत सिंह मान ने दोबारा रचा इतिहास

punjabkesari.in Tuesday, Jun 28, 2022 - 03:07 PM (IST)

संगरूर (विशेष) : पंजाब के संगरूर में हुए उपचुनाव के चुनाव परिणामों के बाद एक बार पिर से नया इतिहास रचा गया है। इस बार यह इतिहास इस सीट से विजयी रहे शिरोमणी अकाली दल (अमृतसर) के अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान ने रचा है। कुछ ऐसी ही स्थिति वर्ष 1998 में भी पैदा हुई थी जब पंजाब में भारी संख्या में सीटें जीत कर भाजपा-शिरोमणी अकाली दल (बादल) गठबंधन को उपचुनाव में हरा कर कांग्रेस ने इतिहास रचा था। उस समय गठबंधन को 90 के करीब सीटें मिली थीं। इस बीच आदमपुर में उपचुनाव का सामना राज्य के सभी दलों को करना पड़ा। उस समय भी उम्मीद थी कि गठबंधन सीट ले जाएगा लेकिन परिणाम कुछ अलग थे। कांग्रेस ने तब आदमपुर की सीट जीत ली थी। ठीक वैसा ही इतिहास आज रचा गया है जब राज्य में आम आदमी पार्टी जो 92 सीटों के साथ स्तात में आई थी, को हरा कर सिमरनजीत सिंह मान ने वही इतिहास दोहराया है।

अगर पंजाब के संगरूर में लोकसभा उपचुनाव का परिणाम की बात करें तो यह ठीक वैसा ही है, जैसा पंजाब में फरवरी महीने में हुए विधानसभा चुनावों का परिणाम 10 मार्च को सामने आया था। 117 में से 92 सीटों पर जीत हासिल करके आम आदमी पार्टी ने सभी की बोलती बंद कर दी थी। लेकिन आज आए लोकसभा के उपचुनाव परिणाम ने खुद आम आदमी पार्टी की बोलती बंद कर दी है। 3 महीने पहले जो पार्टी पंजाब में 42 प्रतिशत वोट लेकर सत्ता पर काबिज हुई थी, वही पार्टी 3 महीने बाद उस लोकसभा सीट पर धराशायी हो गई, जहां से पिछले लगातार दो बार से 'आप' का सांसद बनकर लोकसभा में जा रहा था। आखिर तीन महीने में ऐसा क्या हुआ कि लोगों की मनपसंद पार्टी का उम्मीदवार एक ऐसी पार्टी से हार गया, जिसका विधानसभा चुनावों में कोई वोट प्रतिशत ही नहीं था। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन पर पार्टी को मंथन करना होगा और इन गलतियों को सुधारना पड़ेगा।

कैसे जीत गए सिमरनजीत सिंह मान
77 साल के सिमरनजीत सिंह मान अपने राजनीतिक करियर में तीसरी बार सांसद बने हैं। सभी को हैरानी है कि वो आखिर जीत कैसे गए। राज्य की गर्मख्याली राजनीति के ध्रुव माने जाते सिमरनजीत सिंह मान राज्य की 92 सीटों वाली सरकार को बड़ा झटका देने में सफल रहे हैं। बताया जाता है कि सिमरनजीत सिंह मान ने मालेरकोटला में मुस्लिम वोट को अपनी तरफ आकर्षित करने में बड़ी सफलता हासिल की है। बेशक मान की इमेज कट्टरपंथियों वाली है, लेकिन संगरूर के कई क्षेत्रों खासकर अमरगढ़ व कुछ अन्य इलाकों में हिंदू वर्ग के लिए भी काम करते रहे हैं। खासकर गऊशाला को फंड का मामला हो या फिर अन्य मसले हों। दूसरा जो सबसे बड़ा कारण सिमरनजीत सिंह मान की सफलता का रहा, वह था पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला। 29 मई को सिद्धू मूसेवाला का मर्डर हो गया, लेकिन उससे पहले वह लगातार सिमरनजीत सिंह मान के संपर्क में थे।

सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड
पंजाब में गोलीबारी कोई नई बात नहीं है और यह पहली सरकारों में भी होती रही है, लेकिन कांग्रेस नेता व सिंगर सिद्धू मूसेवाला की हत्या ने पूरे पंजाब को हिलाकर रख दिया। कानून व्यवस्था को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार घेरे में आ गई। ऊपर से संगरूर सीट से जीतने वाले सिमरनजीत सिंह मान ने इस मामले को कैश कर लिया। युवा वर्ग में मूसेवाला की हत्या के बाद रोष था, लेकिन अंतिम संस्कार के दौरान उनके पिता बलकौर सिंह की तस्वीरों ने हर वर्ग को भावुक कर दिया। जो संगरूर में आम आदमी पार्टी का वोट बैंक खिसकाने के लिए काफी था।
वायदों की कतार

पंजाब में सत्ता में आने से पहले आम आदमी पार्टी ने कई तरह के वायदे किए थे, जिनमें से कई वायदे अभी पैंडिंग हैं। इनमें 300 यूनिट मुफ्त बिजली, सस्ती रेत और महिलाओं को 1000 रुपए प्रति माह देने का वायदा 3 महीने से लटका हुआ है। मुफ्त बिजली का जब वायदा किया गया था तो उस समय कोई भी शर्त नहीं थी, लेकिन बाद में कई अन्य शर्तें उसमें जोड़ दी गईं और इसे लागू करने की तारीख भी 1 जुलाई घोषित कर दी गई। महिलाओं को मुफ्त बस सेवा बंद करने तथा बिजली को लेकर पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा की गई घोषणा को वापस लेने की अफवाहें भी राज्य की भगवंत मान सरकार के लिए नुक्सानदायक साबित हुईं।

गायब वर्कर व मंत्री
संगरूर लोकसभा सीट में 3 प्रमुख विधानसभा क्षेत्र आते हैं जिनमें धूरी, दिड़बा तथा बरनाला शामिल हैं। धूरी से भगवंत मान, दिड़बा से हरपाल चीमा तथा बरनाला से मीत हेयर मंत्री हैं। 2 मुख्यमंत्रियों ने जहां प्रचार किया हो, 2 मंत्री तथा 6 विधायक जिस इलाके से हों, उस लोकसभा सीट का हारना बड़ा झटका है। खबर यह भी है कि इलाके में अंतिम दौर में ही मंत्री तथा विधायक देखे गए, जबकि वर्कर ने खुलकर काम ही नहीं किया।

जमीनी वोटर नाराज
राज्य में भगवंत मान सरकार ने कई बड़ी घोषणाएं कीं व योजनाओं को लागू किया, लेकिन वे योजनाएं जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं। संभवतः इन योजनाओं को जमीनी वोटर तक पहुंचने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन वोटर ने इंतजार करने की बजाय अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी। शायद यही कारण था कि 31 साल बाद संगरूर सीट पर सबसे कम मतदान हुआ और लोगों ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई।

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News Editor

Kalash

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