सरकारी अस्पतालों की बड़ी लापरवाही! स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
punjabkesari.in Wednesday, Jul 22, 2026 - 10:56 AM (IST)
अमृतसर (दलजीत): पंजाब के स्वास्थ्य तंत्र में एक हैरान करने वाला खुलासा हुआ है जिसने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। जिला स्तरीय सिविल अस्पताल और अन्य सरकारी अस्पतालों में मैडीकल फिटनैस सर्टीफिकेट जारी करने की प्रक्रिया में भारी लापरवाही सामने आई है। सिविल सर्जन अमृतसर द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में यह बात स्पष्ट की गई है कि विभिन्न भर्तियों के लिए आने वाले उम्मीदवारों की मैडीकल जांच नियमों के अनुसार नहीं की जा रही है। इस गंभीर गड़बड़ी ने साबित कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग के भीतर निगरानी प्रणाली सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई है।
सरकारी अस्पतालों में नियमों का खुला उल्लंघन
पत्र में दर्शाया गया है कि उम्मीदवारों की निर्धारित मैडीकल अधिकारी (विशेषज्ञ) द्वारा जांच करवाना अनिवार्य है, लेकिन हकीकत यह है कि कई सरकारी अस्पतालों में यह प्रक्रिया बेहद ढीली पड़ी हुई है। बिना पूरी जांच किए ही फिटनैस सर्टीफिकेट जारी करने के मामले सामने आ रहे हैं। कई मामलों में मैडीकल टैस्ट स्लिप तक ठीक से नहीं भरी जाती और उम्मीदवारों को सीधे सर्टीफिकेट जारी कर दिया जाता है। यह स्थिति साबित करती है कि सरकारी अस्पतालों में नियमों का पालन सिर्फ नाममात्र रह गया है।
कागजी आदेशों तक सीमित सिस्टम
सिविल सर्जन द्वारा आदेश जारी किए गए हैं कि मैडीकल टैस्ट स्लिप में उम्मीदवार की उम्र, पहचान चिन्ह और मैडीकल अधिकारी की मोहर अनिवार्य होनी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि जब ये गलतियां लंबे समय से चल रही थीं तो स्वास्थ्य विभाग अब तक क्या कर रहा था? इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकारी तंत्र में निगरानी की कमी और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह मामला सिर्फ एक गलती नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी को बेनकाब करता है। सवाल यह भी उठता है कि क्या उच्चाधिकारियों को इस गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
जन-सुरक्षा के साथ खिलवाड़
ऑल इंडिया एंटी करप्शन मोर्चे के चेयरमैन महंत रमेशानंद सरस्वती ने कहा कि बिना ठीक से मैडीकल जांच किए सर्टीफिकेट जारी करना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जन-सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। ऐसे उम्मीदवार जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है वे भी नौकरियों में शामिल हो सकते हैं, जो आगे चलकर गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
क्या सरकारी अस्पतालों पर कोई कंट्रोल है भी या नहीं?
इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी अस्पतालों पर कोई कंट्रोल है भी या नहीं? यदि नियमों का उल्लंघन इतना आम हो गया है तो आखिरकार जिम्मेदारी किसकी बनती है? अब आवश्यकता इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग सिर्फ पत्र जारी करने तक सीमित न रहे बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। मैडीकल सर्टीफिकेट जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। यदि इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया तो यह लापरवाही आगे चलकर बड़े घोटाले का रूप धारण कर सकती है।
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