Jalandhar : स्ट्रीट लाइट टैंडरों को लेकर घिरा निगम प्रशासन, अधिकारियों की बढ़ी चिंता !

punjabkesari.in Thursday, Jun 25, 2026 - 12:02 PM (IST)

जालंधर (खुराना): जालंधर नगर निगम के स्ट्रीट लाइट विभाग द्वारा जारी किए गए 8.25 करोड़ रुपए के टैंडरों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। टैंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, एक विशेष ठेकेदार को फायदा पहुंचाने तथा विभिन्न आइटमों के रेट बढ़ाकर तय करने के आरोपों ने निगम प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मामला अब लोकल बॉडीज विभाग के चीफ विजिलेंस ऑफिसर तक पहुंच चुका है, जिसके चलते आने वाले दिनों में इस पूरे प्रकरण की जांच होने की संभावना जताई जा रही है।

जानकारी के अनुसार स्ट्रीट लाइट विभाग के कुछ अधिकारियों ने पिछले समय के दौरान स्ट्रीट लाइटों से जुड़े दो दर्जन से अधिक छोटे-छोटे कार्यों को एक साथ क्लब कर लगभग 8.25 करोड़ रुपए के पांच बड़े टैंडर जारी किए थे। आरोप है कि टेंडरों को जानबूझकर बड़े आकार का बनाया गया ताकि नगर निगम में वर्षों से कार्य कर रहे छोटे और मध्यम श्रेणी के ठेकेदार तकनीकी शर्तों के कारण प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएं और केवल एक-दो बड़े ठेकेदार ही पात्र रह जाएं।

सूत्रों के अनुसार जब यह मामला सार्वजनिक हुआ तो मेयर वनीत धीर और सीनियर डिप्टी मेयर बलबीर सिंह बिट्टू ने अधिकारियों के इस कदम पर कड़ा एतराज जताया। इसके बाद निगम स्तर पर इस बात पर सहमति बनती दिखाई दे रही है कि 8.25 करोड़ रुपए के इन बड़े टैंडरों को रद्द कर उनकी जगह कम राशि के अलग-अलग टैंडर जारी किए जाएं, ताकि निगम के साथ लंबे समय से कार्य कर रहे छोटे ठेकेदारों को भी प्रतिस्पर्धा का अवसर मिल सके।

मामले को और गंभीर बनाते हुए कुछ शिकायतकर्त्ताओं ने लोकल बॉडीज विभाग के चीफ विजिलेंस  ऑफिसर को लिखित शिकायत भेजी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि टैंडरों की शर्तें इस प्रकार बनाई गईं कि एक विशेष ठेकेदार को लाभ मिल सके। साथ ही स्ट्रीट लाइट सैट, केबल तथा अन्य संबंधित सामग्री के रेट भी आवश्यकता से अधिक रखे गए, जिससे नगर निगम को आर्थिक नुकसान पहुंचने की आशंका है।

सूत्रों का कहना है कि यदि निगम प्रशासन टैंडरों को रद्द भी कर देता है, तब भी विजिलेंस विभाग इस पूरे प्रकरण की जांच कर सकता है। माना जा रहा है कि चीफ विजिलेंस  ऑफिसर द्वारा निगम प्रशासन से पूरी रिपोर्ट तलब की जा सकती है, जिसमें टैंडर प्रक्रिया, तकनीकी शर्तों, अनुमानित लागत और वित्तीय बोली से संबंधित सभी दस्तावेजों की जांच की जाएगी।

इस बीच स्ट्रीट लाइट विभाग के पुराने कार्यों को लेकर भी कई सवाल उठने लगे हैं। विभाग के भीतर चर्चा है कि पूर्व में भी कुछ टैंडरों में मुकाबलेबाज़ी को प्रभावित करने के प्रयास हुए थे। एक मामले में दो ठेकेदारों द्वारा आपस में पूल करके अलग-अलग टैंडर आपस में बांट लेने के आरोप लगे थे, जिसके कारण निगम को अपेक्षित डिस्काऊंट नहीं मिल पाया था।

वर्तमान विवादित 8.25 करोड़ रुपए के टैंडरों में भी कम डिस्काऊंट मिलने की बात सामने आ रही है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि नगर निगम के साथ वर्षों से कार्य कर रहे स्थानीय और छोटे ठेकेदार सामान्य तौर पर 35 से 40 प्रतिशत तक का डिस्काऊंट देने को तैयार रहते हैं, जबकि विवादित टैंडरों में भाग लेने वाले बड़े ठेकेदार द्वारा मात्र 5 से 7 प्रतिशत डिस्काऊंट पर ही काम हासिल किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर निगम प्रशासन को अधिक आर्थिक लाभ पहुंचाने वाले विकल्पों को नजरअंदाज क्यों किया गया।

जानकारों का मानना है कि यदि विजिलेंस विभाग तकनीकी बोली और वित्तीय बोली दोनों की विस्तार से जांच करता है तो टैंडर प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। विशेष रूप से विभिन्न आइटमों के निर्धारित रेट, प्रतिस्पर्धा की स्थिति और प्राप्त डिस्काउंट की तुलना जांच का प्रमुख आधार बन सकती है।

चुनावी वर्ष के मद्देनजर यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बनता जा रहा है। नगर निगम के स्ट्रीट लाइट विभाग में तैनात अधिकारियों की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और विपक्षी दलों के साथ-साथ कई सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग शुरू कर दी है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक गर्माने के आसार हैं तथा निगम प्रशासन पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने का दबाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।

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News Editor

Urmila

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